श्री विश्वकर्मा प्रभु वंदौं, चरण कमल जोरि हाथ। शिल्प विद्या बल दीजै, सदा रहहु मम साथ॥
Vishwakarma Chalisa
विश्वकर्मा चालीसा
देव-शिल्पी भगवान श्री विश्वकर्मा जी की स्तुति में रचित संपूर्ण 42-पंक्तियों का पावन पाठ, जो निर्माण कला, शिल्प विद्या, तकनीकी कौशल, उद्योग और उन्नति प्रदान करता है।
जय जय श्री विश्वकर्मा देवा। सब सुर नर मुनि करहीं सेवा॥
अद्भुत सृष्टि रची तुम स्वामी। विश्वकर्मा तुम अंतरयामी॥
ऋषि अंगिरा के तुम अवतारा। जग हित हेतु धरयो अवतारा॥
ब्रह्मा विष्णु शिव सुरभूपा। तुमरो रूप अनूप अनूपा॥
सत्यलोक कैलाश मँझारा। स्वर्गपुरी जग रचेउ अपारा॥
स्वर्गपुरी लंका तुम ढापि। द्वारका पूरी रची अनूपि॥
जगन्नाथ का मन्दिर धारा। जहाँ बिराजे कृष्ण मुरारा॥
पुष्पक विमान रचेउ तुम भारी। जाकी महिमा जग में न्यारी॥
यंत्र तंत्र अस्त्र सब कीन्हा। उद्योगी जन कूँ फल दीन्हा॥
शिल्प कला के तुम आधार। सब जग पूजे बारंबार॥
परशुराम को धनुष बनायो। कालदण्ड यम को चमकायो॥
विष्णु चक्र सुदर्शन धारा। शिव का त्रिशूल तुम ही संवारा॥
इन्द्र का वज्र तुमने ढाला। जाते कांपे असुर विशाला॥
विश्वकर्मा तुम हो सुखदाता। कारीगर जन के पितु माता॥
जो जन ध्यान तुम्हारा लावै। शिल्प विद्या सो सहज ही पावै॥
काष्ठ लौह और पाषाण ज्ञानी। सब जग जाने तुम महिमा बानी॥
भवन वास्तु के तुम हो स्वामी। जय जय जय सर्वज्ञ नामी॥
यंत्र यन्त्रालय में तुम राजो। उद्योगन में तुम ही छाजो॥
भाद्रपद शुक्ल कन्या संक्रांति। पूजे तुमको जन अति शांति॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावैं। आरती गाकर शीश नवावैं॥
औजारों की पूजा करहीं। ताते सब संकट परिहरहीं॥
व्यापार उद्योग में हो वृद्धि। मिले सफलता ऋद्धि और सिद्धि॥
जो जन तुमको सुमिरन करहीं। ताके दुःख दरिद्र सब टरहीं॥
बुद्धि बल कौशल देहु सुस्वामी। दूर करो मम भूल अज्ञामी॥
काटहु विघ्न हरो सब पीरा। जय जय जय विश्वकर्मा बीरा॥
दीन हीन पर कृपा करो तुम। सुख संपत्ति से गृह भरो तुम॥
सृष्टि चक्र तुम ही चलावो। प्राणी मात्र को अन्न दिलावो॥
भक्त जनों की आस पुरावो। चरण शरण में मोहि लगावो॥
इंजीनियर कारीगर ध्यावैं। मनवांछित सब सुफल पावैं॥
शिल्प शाला में तुम बिराजो। बिगड़े काम सबहिं तुम साजो॥
तुम्हरी कृपा सुगम सब काजा। तुम ही देव शिल्प के राजा॥
जय जगपति जय जय जगदीशा। तुम चरणन में नवाऊँ शीशा॥
जो यह पाठ करै चालीसा। तापर कृपा करैं जगदीशा॥
नित नेम करि पाठ सुनावे। सो प्राणी सब सुख ही पावे॥
धन धान्य और विद्या बाढ़ै। संकट कोई निकट न आवै॥
सच्चे मन से जो कोई ध्यावै। सिद्धि ऋद्धि सो प्राणी पावै॥
विश्वकर्मा प्रभु आस तुम्हारी। हरहु सकल मम विपद भारी॥
सदा रहहु तुम मोरी सहाई। जय जय जय श्री विश्वकर्मा राई॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावै। सो प्राणी परम पद पावै॥
विश्वकर्मा की आरती गाओ। अपने जीवन सफल बनाओ॥
ताके घर विद्या शिल्प धन, बाढ़ै नित्य अपार। विश्वकर्मा कृपा से, होवै बेड़ा पार॥

